ये चांदनी भी जिन को छूते हुए डरती है
दुनिया उन्ही फूलों को पैरों से मसलती है .
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस दाल पे बैठे हो वोह टूट भी सकती है .
लबों में चिंगारी जैसे कोई रख जाए
यूं याद तेरी शब् भर सीने में सुलगती है .
आ जाता है खुद खिंच कर दिल सीने से पटरी पर
जब रात की सरहद से एक रेल गुज़रती है .
आंसू कभी पलकों पर देर तक नहीं रुकते
उड़ जाते हैं ये पंछी जब शाख लचकती है.
खुश रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये
बिछड़े हुए मिलते हैं जब बर्फ पिघलती है .....
एक ग़ज़ल जो मुझे बहुत पसंद है, उम्मीद आपको भी पसंद आएगी.....
wah wah...................janab kya baat hai..
ReplyDeletegud Atul, keep it up.....
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