
भारत में पैदा हुए विवाद के मुद्दों में मैं आरक्षण के मुद्दे को सबसे अधिक विवादित मानता हू। इसके कारण भी है कई सारे, जैसे इसी मुद्दे पे कुछ पार्टियो का राजनतिक भविष्य टिका है, तो कुछ नेताओ का भविष्य। आरक्षण का मुद्दा थोडा सा सर उठता नहीं है की सामाजिक विद्वेष फैलाना शुरु हो जाता है। इस पे बहुत लिखा गया है की आरक्षण का आधार क्या होना चाहिए। सामाजिक या आर्थिक। या दोनों । आज से दो तीन दशक पहले आरक्षण का सामाजिक आधार उचित था, क्यूकी उस समय सामाजिक विषमताए ज्यादा थी। पर आज की स्थिति एकदम उल्टा है। आज सामाजिक विषमताए कम आर्थिक विषमता ज्यादा है। आमिरी और गरीबी में कुछ ज्यादा ही अंतर हो गया है। आज हर तरफ से आरक्षण की मांग उठ रही है, कही से मजहब के नाम पे तो कही से जाती के नाम पे। राजस्थान में गुर्जर आन्दोलन हम देख चुके है।
संविधान में दस वर्ष के लिए जो आरक्षण की छुट पिछड़े वर्ग को शेष समाज के बराबर लाने के लिए दिया गया था उसे बाद में स्थाई बना दिया गया। और समाज को इसके फायदे के साथ कुछ नुकसान भी हुआ। उन पिछड़े लोगो में भी एक अभिजात्य वर्ग का जन्म हो गया, और वे लोग आरक्षण के प्रावधानों पे कुंडली मार के बैठ गए। नतीजा ये हुआ की उसी वर्ग में कुछ परिवार अधिक संपन्न हो गये और बाकि और गरीब होते चले गए।
सरकारी आंकड़े के अनुसार देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालो में 80% अनुसूचित जाती, पिछड़े और मुसलमान है।
सोचने की जरुरत ये है की आरक्षण का लाभ मिलता किसे है, ये सब जानते है की आरक्षण का अधिकतर लाभ उसे मिलता है जिसे उसकी जरुरत नहीं है। देश में आरक्षण का आधार अभी भी सामाजिक ही है। तो क्या समाज की मुख्य धरा में आ गए लोगो को भी इसका लाभ मिलना चाहिए ? क्या लालू प्रसाद, मायावती, मुलायम, रामविलास पासवान, शरद यादव को आरक्षण देना उचित है? क्या से सारे नेता समाज की मुख्य धरा में नहीं है? क्या ये किसी भी अगड़ी जाती के बराबर नहीं है? यही बात समाज के उस पिछड़े वर्ग के परिवार पे भी लागू होती है जो अब सामाजिक रूप से काफी आगे है और संपन्न है तो क्या उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए?
दूसरी बात और की आरक्षण का लाभ कहा कहा मिलना चाहिए। किसी को मेडिकल या इंजीनियरिंग या किसी और कोर्स में दाखिले समय आरक्षण मिलता है तो क्या उसे उसी डिग्री के आधार पे नौकरी में भी आरक्षण देना उचितहै। क्या यह हमारी शिक्षा व्यवस्था पे प्रश्न चिन्ह नहीं है की हम पांच साल की उच्च शिक्षा के बाद भी उसे आरक्षण के लोभ से बहार नहीं निकाल पाए या फिर बिना आरक्षण के आगे बड़ने के लायक नहीं बना सके, तो फिर उस उच्चशिक्षा का क्या मतलब।
जिन जातियों को पिछड़ा माना गया है उन्हें आर्थिक पिछड़ेपन के कारण ही इस वर्ग में रखा गया था । जिस प्रकार किसी बीमार प्राणी के स्वस्थ होने के बाद उसे दावा नहीं दी दी जाती उसी प्रकार कमजोर को सबल बनाने के लिए स्थाई रूप से आरक्षण की बैशाखी नहीं दी जा सकती । जिन्हें कमजोर माना गया उन्हें सक्षम बनाने के उपायों पे कभी ध्यान नहीं दिया गया बल्कि उन्हें बैसाखी के सहारे ही खड़े रहने के लिए तरह तरह के उपाए किये जाते रहे। इस से विषमता के नए आयाम का जन्म हुआ, जो जन्म के आधार पर बनी विषमता से भी अधिक सामाजिक विद्वेष का कारण बनता जा रहा है।
इसलिए यह आवश्यक हो गया है की उसका पुनः निर्धारण हो । उचित तो यह होगा की पात्रता का मापदंड योग्यता को ही माना जाये, लेकन राजनितिक स्वार्थ के चलते ऐसा मापदंड अपनाना फ़िलहाल संभव दिखाई नहीं पद रहा है।
गरीबी रेखा के निचे जीवन यापन करने वाले सभी लोगो को आरक्षण का पत्र मान लेने से निरंतर फ़ैल रहा जातीय विद्वेष समाप्त हो जायेगा।
आखिर आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोगो को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए ? इसके लिए राष्ट्रीय सहमती की आवश्यकता है।
आखिर कोई भी समाज समानता के सिधांत को अपनाता है न की विषमता का।
"हो गई है पीर पर्वत- सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए॥
----------------------------------------------दुष्यंत कुमार
संविधान में दस वर्ष के लिए जो आरक्षण की छुट पिछड़े वर्ग को शेष समाज के बराबर लाने के लिए दिया गया था उसे बाद में स्थाई बना दिया गया। और समाज को इसके फायदे के साथ कुछ नुकसान भी हुआ। उन पिछड़े लोगो में भी एक अभिजात्य वर्ग का जन्म हो गया, और वे लोग आरक्षण के प्रावधानों पे कुंडली मार के बैठ गए। नतीजा ये हुआ की उसी वर्ग में कुछ परिवार अधिक संपन्न हो गये और बाकि और गरीब होते चले गए।
सरकारी आंकड़े के अनुसार देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालो में 80%
सोचने की जरुरत ये है की आरक्षण का लाभ मिलता किसे है, ये सब जानते है की आरक्षण का अधिकतर लाभ उसे मिलता है जिसे उसकी जरुरत नहीं है। देश में आरक्षण का आधार अभी भी सामाजिक ही है। तो क्या समाज की मुख्य धरा में आ गए लोगो को भी इसका लाभ मिलना चाहिए ? क्या लालू प्रसाद, मायावती, मुलायम, रामविलास पासवान, शरद यादव को आरक्षण देना उचित है? क्या से सारे नेता समाज की मुख्य धरा में नहीं है? क्या ये किसी भी अगड़ी जाती के बराबर नहीं है? यही बात समाज के उस पिछड़े वर्ग के परिवार पे भी लागू होती है जो अब सामाजिक रूप से काफी आगे है और संपन्न है तो क्या उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए?
दूसरी बात और की आरक्षण का लाभ कहा कहा मिलना चाहिए। किसी को मेडिकल या इंजीनियरिंग या किसी और कोर्स में दाखिले समय आरक्षण मिलता है तो क्या उसे उसी डिग्री के आधार पे नौकरी में भी आरक्षण देना उचितहै। क्या यह हमारी शिक्षा व्यवस्था पे प्रश्न चिन्ह नहीं है की हम पांच साल की उच्च शिक्षा के बाद भी उसे आरक्षण के लोभ से बहार नहीं निकाल पाए या फिर बिना आरक्षण के आगे बड़ने के लायक नहीं बना सके, तो फिर उस उच्चशिक्षा का क्या मतलब।
जिन जातियों को पिछड़ा माना गया है उन्हें आर्थिक पिछड़ेपन के कारण ही इस वर्ग में रखा गया था । जिस प्रकार किसी बीमार प्राणी के स्वस्थ होने के बाद उसे दावा नहीं दी दी जाती उसी प्रकार कमजोर को सबल बनाने के लिए स्थाई रूप से आरक्षण की बैशाखी नहीं दी जा सकती । जिन्हें कमजोर माना गया उन्हें सक्षम बनाने के उपायों पे कभी ध्यान नहीं दिया गया बल्कि उन्हें बैसाखी के सहारे ही खड़े रहने के लिए तरह तरह के उपाए किये जाते रहे। इस से विषमता के नए आयाम का जन्म हुआ, जो जन्म के आधार पर बनी विषमता से भी अधिक सामाजिक विद्वेष का कारण बनता जा रहा है।
इसलिए यह आवश्यक हो गया है की उसका पुनः निर्धारण हो । उचित तो यह होगा की पात्रता का मापदंड योग्यता को ही माना जाये, लेकन राजनितिक स्वार्थ के चलते ऐसा मापदंड अपनाना फ़िलहाल संभव दिखाई नहीं पद रहा है।
गरीबी रेखा के निचे जीवन यापन करने वाले सभी लोगो को आरक्षण का पत्र मान लेने से निरंतर फ़ैल रहा जातीय विद्वेष समाप्त हो जायेगा।
आखिर आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोगो को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए ? इसके लिए राष्ट्रीय सहमती की आवश्यकता है।
आखिर कोई भी समाज समानता के सिधांत को अपनाता है न की विषमता का।
"हो गई है पीर पर्वत- सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए॥
----------------------------------------------दुष्यंत कुमार
if they want to keep quotas then it must be on financial basis not on caste basis ......
ReplyDeletenic very nic dear....................