Saturday, March 27, 2010

महानायक बनाम कांग्रेस


चापलूसी की अपनी एक दुनिया होती है, वे अपने मालिको को खुश करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते है अब कुछ कांग्रेसी अपने आलाकमान को खुश करने के लिए अमिताभ को लगभग गली दे रहे है। सीधी बात ये की की वे गाँधी परिवार को खुश करने की कोशिश कर रहे है, वो भी एक ऐसे आदमी को दुःख पंहुचा के जो भारत का महानायक है। कांग्रेस के किसी भी नेता से ज्यादा लोकप्रिय। महारास्त्र के मुख्यमंत्री ने जो कहा है वो बहुत ही शर्मनाक है। पहले समारोह में उन्ही के एक मंत्री ने बिग बी को बुलाया और मुख्यमंत्री ने उनके साथ मंच साझा किया। जब कांग्रेस ने आपति उठाई तो कह दिया की अगर मुझे मालूम होता की अमिताभ आ रहे है तो मैं नहीं जाता। तो क्या अशोक जी अंधे हो गये थे, कार्ड पे नाम नहीं पढ़ा, या समारोह में देखा नहीं अमिताभ को, या फिर पहचानते नहीं थे महानायक को। ये परिचायक है कांग्रेस में घुस चुकी चाटुकारिता संस्कृति का। ठीक है गाँधी और बच्चन परिवार के रिश्ते ठीक नहीं है, तो क्या कांग्रेस के नेता अमिताभ को अपमानित करते रहेंगे।

सबसे शर्मनाक ये की एक मुख्यमंत्री को सफाई देनी पड़ी की वे क्यों अमिताभ के साथ थे। इस बात से राज ठाकरे और अशोक चौहाण में फर्क नहीं रहा है। एक मुख्यमंत्री को तो इतनी समझ होनी चाहिए की अपने अथिति की इज्जत करनी चाहिए वो भी जब अतिथि महानायक हो। आखिर अमिताभ बिन बुलाये गए नहीं थे। अब ये देखना दिलचस्प होगा की इतने बड़े कांग्रेसी राज्य में और पुरे देश के किसी सरकारी समारोह में अगर बिग बी जाते है तो क्या सारे कांग्रेसी वह से भाग जायेंगे।

कांग्रेस्सियो के अनुसार उनकी गलती ये है वे गुजरात के विकाश का प्रचार कर रहे हैं। क्या गुजरात इस देश का अंग नहीं है ? क्या गुजरात के विकाश में ऐसा कुछ नहीं है जिसे बताया जा सके ? क्या टाटा और अम्बानी बेवकूफ है जो गुजरात में निवेश कर रहे है ? गुजरात तो कांग्रेस के महारास्त्र से कही अच्छा है जहा कम से कम लोगो को भाषा या फिर क्षेत्र के आधार पे भगाया या मारा नहीं जाता।

अमिताभ ने भी करारा जवाब दिया है की क्या कांग्रेस में हिम्मत है जो टाटा या अम्बानी को गुजरात में निवेश से रोक सके। महारास्त्र के मुख्यमंत्री को बिग बी से सार्वजनिक माफ़ी मंगनी चाहिए।


कांग्रेस इन सब मामलो से लोगो का ध्यान भटकना चाहती है की लोग ये न सोच पाए की हमारी सरकार कितनी नाकारा और निक्कमी है जो आर्थिक और विदेश निति पे सब जगह फेल है।

क्या किसी समारोह में अगर अमिताभ को खुद मनमोहन या प्रणव मुखर्जी सम्मानित करे तो क्या कांग्रेस के किसी भी नेता या आलाकमान में हिम्मत है जो इन दोनों को कुछ कहे।


यह मामला कांग्रेस की चाटुकारिता संस्कृति का बेहद उम्दा उदाहरण है। ये कांग्रेसी सोनिया या राहुल को खुश करने के लिए अपने बाप तक को गली दे सकते है तो फिर अमिताभ तो उनके कुछ नहीं लगते। अगर राजा चापलूसों से घिरा रहे तो उसे अपने प्रजा की तकलीफों की जानकारी नहीं होती या फिर ख्याल नहीं रहता। नेताओ में चापलूसी की ये गन्दी आदत कांग्रेस के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

Wednesday, March 10, 2010

महिला आरक्षण


अबला तेरी यही कहानी
आंचल में हैं दूध आँखों में पानी।

ये बाते अब पुरानी हो गयी। अब ज़ब महिला बिल राज्य सभा में पास हो गया है केवल लोकसभा में पास होना बाकि है। बहुत कुछ हैं लिखने को पर सोच रहा हू की क्या लिखू। कितना लिखू । समझ में नहीं आ रहा । शुरू इतिहास से करू या आज से। आज से ही करता हू । या कुछ दिन पहले से । क्यों की भारत या दुनिया की महिलाओ की आज़ादी या अधिकार का इतिहास बहुत अच्छा नहीं है । आज हम इतिहास बनाने की कगार पे खड़े है, केवल वक कदम दूर। हमारा लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, पर सदन में महिलाओ की संख्या केवल 45 है। पर उम्मीद है की जल्द ही यह संख्या इक तिहाई पहुच जाएगी ।
आजादी के बाद अपने आप ही हमारे महिलाओ को वोटिंग का अधिकार मिल गया और अमेरिका में 70 साल के संघर्ष के बाद 1920 में मिला। अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई, पर भारत में 1966 में इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बन गई। वर्ल्ड इकोनोमी फोरम के अनुसार भारत स्त्रियों के अधिकारों के मामलो में अमेरिका से आगे है ।
जिस बिल को बहुत पहले पास हो जाना चाहिए था उस बिल को पास करने के लिए राज्यसभा में मार्शल्स की मदद लेनी पड़ी। हमारे सांसदों को इस लज्जा जनक घटना से बचाना चाहिए था। इक तिहाई महिलाओ के सत्ता में पहुचने से सकारात्मक असर पड़ेगा इसकी उम्मीद की जनि चाहिए ।
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस बिल के पास हो जाने से सबसे जहीन जम्हूरियत भी बन जायेगा। आज हमारे यहाँ कुछ सबसे बड़े पद इनके हाथ में है- सोनिया गाँधी, सुषमा स्वराज, किरण मजुमदार, २१ कंपनियो की प्रमुख, मायावती, ममता बनर्जी , निरुपमा राव और भी बहुत है।
आज किसी भी मुल्क के मुकाबले हमारे यहाँ कामकाजी महिलाओ की संख्या सबसे ज्यादा है। अमेरिका के मुकाबले डॉक्टर वैज्ञानिक प्रोफेसर हमारे यहाँ ज्यादा है।
मुझे बहुत ख़ुशी है की बिल पास हो जायेगा और होना भी चाहिए , पर अभी भी कुछ सवाल है जो टीस देते है जैसे की गर्भ में कन्याओ की हत्या, महिलाओ ली सुरक्षा कुछ और मामले। बिल पास होने के साथ पुरुष की मानसिकता भी बदलनी चाहिए।

"क़द्र अब तक तेरी तारीख ने जनि ही नहीं,
तुझमे शोले भी है , बस अशक्फिसानी ही नहीं,
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं,
अपनी तारीख का उन्नाव बदलना है तुझे,
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे"