Wednesday, March 10, 2010

महिला आरक्षण


अबला तेरी यही कहानी
आंचल में हैं दूध आँखों में पानी।

ये बाते अब पुरानी हो गयी। अब ज़ब महिला बिल राज्य सभा में पास हो गया है केवल लोकसभा में पास होना बाकि है। बहुत कुछ हैं लिखने को पर सोच रहा हू की क्या लिखू। कितना लिखू । समझ में नहीं आ रहा । शुरू इतिहास से करू या आज से। आज से ही करता हू । या कुछ दिन पहले से । क्यों की भारत या दुनिया की महिलाओ की आज़ादी या अधिकार का इतिहास बहुत अच्छा नहीं है । आज हम इतिहास बनाने की कगार पे खड़े है, केवल वक कदम दूर। हमारा लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, पर सदन में महिलाओ की संख्या केवल 45 है। पर उम्मीद है की जल्द ही यह संख्या इक तिहाई पहुच जाएगी ।
आजादी के बाद अपने आप ही हमारे महिलाओ को वोटिंग का अधिकार मिल गया और अमेरिका में 70 साल के संघर्ष के बाद 1920 में मिला। अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई, पर भारत में 1966 में इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बन गई। वर्ल्ड इकोनोमी फोरम के अनुसार भारत स्त्रियों के अधिकारों के मामलो में अमेरिका से आगे है ।
जिस बिल को बहुत पहले पास हो जाना चाहिए था उस बिल को पास करने के लिए राज्यसभा में मार्शल्स की मदद लेनी पड़ी। हमारे सांसदों को इस लज्जा जनक घटना से बचाना चाहिए था। इक तिहाई महिलाओ के सत्ता में पहुचने से सकारात्मक असर पड़ेगा इसकी उम्मीद की जनि चाहिए ।
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस बिल के पास हो जाने से सबसे जहीन जम्हूरियत भी बन जायेगा। आज हमारे यहाँ कुछ सबसे बड़े पद इनके हाथ में है- सोनिया गाँधी, सुषमा स्वराज, किरण मजुमदार, २१ कंपनियो की प्रमुख, मायावती, ममता बनर्जी , निरुपमा राव और भी बहुत है।
आज किसी भी मुल्क के मुकाबले हमारे यहाँ कामकाजी महिलाओ की संख्या सबसे ज्यादा है। अमेरिका के मुकाबले डॉक्टर वैज्ञानिक प्रोफेसर हमारे यहाँ ज्यादा है।
मुझे बहुत ख़ुशी है की बिल पास हो जायेगा और होना भी चाहिए , पर अभी भी कुछ सवाल है जो टीस देते है जैसे की गर्भ में कन्याओ की हत्या, महिलाओ ली सुरक्षा कुछ और मामले। बिल पास होने के साथ पुरुष की मानसिकता भी बदलनी चाहिए।

"क़द्र अब तक तेरी तारीख ने जनि ही नहीं,
तुझमे शोले भी है , बस अशक्फिसानी ही नहीं,
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं,
अपनी तारीख का उन्नाव बदलना है तुझे,
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे"

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