
बाबा रामदेव को पुलिस ने आधी रात के बाद उठा लिया और ज़ोर-ज़बरदस्ती के बल पर पंडाल खाली करा दिया। मीडिया वाले चकित हैं कि सरकार ने आखिर ऐसा क्यों किया। आम राय यही है कि यूपीए सरकार का यह कदम कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के खिलाफ ही जाएगा। क्या यह विनाशकाले विपरीत बुद्धि का परिचायक है? हो सकता है। लेकिन मानने को मन नहीं करता कि जिस कांग्रेस में इतने घाघ भरे पड़े हैं, वे अपनी कब्र खुद ही खोदने वाला ऐसा कदम बिना सोचे-समझे उठाएंगे।
बाबा का अनशन शुरू होने से पहले ही सरकार के मंत्री जिस तरह उनसे चर्चा कर रहे थे, उससे यही लग रहा था कि यह अनशन ज्यादा लंबा नहीं चलेगा। लेकिन यह भी पता था कि अगर सहमति हो गई तो भी अनशन शुरू तो ज़रूर होगा। चूंकि अनशन का प्रोग्राम बहुत पहले से बन गया था, रामलीला मैदान में हजारों की भीड़ इकट्ठा होना भी तय था, मीडिया भी इसको टीआरपी की ही खातिर रात-दिन दिखाएगा, यह भी मालूम था – इसलिए इसकी उम्मीद कम थी कि बाबा सरकार द्वारी मांगें मान लिए जाने के बावजूद राष्ट्रीय लाइमलाइट में आने का यह सुनहरा मौका छोड़ देंगे।
शनिवार शाम तक उम्मीद थी कि सरकार बाबा की विभिन्न मांगों पर कुछ कमिटियां बनाने का लिखित वादा करके मामले को अस्थायी तौर पर निपटा देगी। बाबा भी बार-बार यह घोषणा कर रहे थे कि वह सरकार गिराने के लिए यह अनशन नहीं कर रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार ने उनकी मांगें मानीं तो वह सरकार को भी श्रेय देंगे। लेकिन कहीं कुछ ज़रूर हुआ इस बीच जिसने दोनों पक्षों के बीच हो रही सहमति का पुल तोड़ दिया। सरकार ने वह गोपनीय चिट्ठी जारी कर दी जिसमें बाबा के सहयोगी ने वादा किया गया था कि शाम तक बाबा अनशन तोड़ देंगे। इसके बाद बाबा भी भड़क गए कि सरकार ने उनसे धोखा किया। फिर आधी रात को जो हुआ, वह हम सब जान ही गए हैं।
आज या कल में सरकार की तरफ से बताया जाएगा कि वह यह सब करने के लिए 'मजबूर' क्यों हुई। वह शायद यह कहे कि हमने बाबा की सारी वाजिब मांगें मान ली थीं और गैरवाजिब मांगें (जैसे भ्रष्टाचार के लिए फांसी की सज़ा आदि) नहीं मानी जा सकतीं। सवाल पूछा जा सकता है कि क्या 100 रुपए लेने पर किसी पुलिसवाले को मृत्युदंड दे दिया जाएगा?
सरकार उनकी मांगों को मानने वाली चिट्ठी भी जारी कर दे और अगले कुछ दिनों में उनके उठाए मुद्दों पर कमिटियां भी बना दे। हम जानते हैं कि किसी भी मामले से ध्यान हटाने या उसको लटकाने के लिए कमिटी बनाना हमारी सरकारों का पुराना धंधा है। अगर रिपोर्ट देने के लिए कोई टाइम तय कर भी दिया तो वह हर तीन या छह महीने के बाद बढ़ाया जा सकता है। और अंततः कमिटी की रिपोर्ट को माना जाए, यह भी बाध्यता नहीं। शुंगलू कमिटी के मामले में हम देख ही रहे हैं।
तो सारी उम्मीद थी कि सरकार बाबा रामदेव को बहला-फुसला लेगी और रामदेव भी बहल-फुसल जाएंगे। इसमें दोनों पक्षों का फायदा होगा – रामदेव अपने-आप को राष्ट्रीय राजनीति में प्रोजेक्ट भी कर लेंगे और सरकार पर से आया संकट भी टल जाएगा।
लेकिन जो हुआ, वह इसके उलट हुआ। सरकार की किरकिरी हुई और रामदेव और बड़े हीरो बन गए। क्या सरकार को यह मालूम नहीं था कि वह जो कर रही है, उससे रामदेव को ही फायदा होगा?
या कहीं यह इसीलिए तो नहीं हो रहा है कि सरकार चाहती है कि रामदेव को हीरो बनाया जाए, उनका गुस्सा बढ़ाया जाए, इस गुस्से की आग में उनका कद और उनकी महत्वाकांक्षा बढ़ाई जाए। इतनी बढ़ाई जाए कि वह खुद को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगें और इस दिशा में अपनी पार्टी बना लें, चुनाव लड़ें। अब आप सोच ही सकते हैं कि अगर रामदेव के मन में यह इच्छा जग गई (क्या जानें, पहले से जगी हुई हो) तो उनके इस कदम से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा?
ज़रा गहराई में जाएंगे तो साफ हो जाएगा कि रामदेव को हीरो बनाने से कांग्रेस को ही फायदा है और नुकसान है बीजेपी को। बीजेपी और आरएसएस आज भले ही बाबा रामदेव का खुला समर्थन कर रहे हों लेकिन अंदर ही अंदर उनको यह डर भी है कि कहीं बाबा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग गई तो उनके ही वोट कटेंगे। बाबा महात्मा गांधी नहीं हैं कि नेहरू को सत्ता दिला दी, खुद उससे दूर रहे, न वह जयप्रकाश नारायण हैं जिन्होंने 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनवाई थी लेकिन खुद कोई पद नहीं लिया। बाबा रामदेव राजनीति में आएंगे तो ऐक्टिवली आएंगे, कुछ करने और कुछ पाने के लिए आएंगे। वह कोई शत्रुघ्न सिन्हा नहीं हैं बीजेपी के टिकट पर एक लोकसभा सीट या छोटा-मोटा मंत्रिपद लेकर संतुष्ट हो जाएं। वह तो चाहेंगे कि जैसे एन.टी. रामाराव ने 1982 में आंध्र प्रदेश में अपने बल पर तेलुगू देशम पार्टी बनाई और कांग्रेस को उखाड़ फेंका, वैसे ही वह भी ऐसी पार्टी बनाएं जो अपने बल पर सत्ता में आने की ताकत रखती हो। वह चाहेंगे कि उनके लोगों को ज्यादा से ज्यादा सीटें मिलें। उनकी यह मांग, उनकी महत्वाकांक्षा सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे और सत्ता में आने का सपना देख रहे बीजेपी-संघ के नेताओं को क्यों और कैसे पच सकती है? वह जो देश में रामराज्य लाने का नारा देते हैं, वह रामदेव का राज लाने के लिए थोड़े ही है!
कांग्रेस का यह पुराना तरीका है। पंजाब में उसने अकाली दल को पीटने के लिए भिंडरांवाले को शह दी लेकिन अंततः यह उसके और देश के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। अब लगता है कि बीजेपी के वोट काटने के लिए ही रामदेव को हीरो बना रहे हैं। यह चाल कितनी कामयाब होगी, अभी से कहना मुश्किल है। सबकुछ रामदेव के अगले कदम पर निर्भर करता है। खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि शुरू हुआ है। कह सकते हैं कि 'राम से राज तक' नामक मूवी का टाइटल सीन चल रहा है। हो सकता है, रामदेव हरिद्वार से ही अपना अनशन जारी रखने की घोषणा करें। तब क्या होगा? क्या कांग्रेस के घाघ शकुनियों ने इसके बारे में भी कुछ सोचा है?
चलिए, हम भी आगे के सीन का इंतज़ार करें
...........................ATUL KUMAR RAI
ek baat samajh me nahi aayi ki UPA gov apne pair pe kulhadi kyo maar rahi hai....
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ek to election bahut karib hai
2.
baba ko chher diye
3.
bacha khucha kaam mahangayi maar gayi...