Friday, February 12, 2010

SHAHRUKH vs. Bal Thackeray


इसे शिवसेना की जीत माने या महारास्त्र सरकार की हार । कुछ समझ में नहीं आता । कुछ सिनेमा घरो में फिल्म रिलीज़ हो गई , तो इसे शाहरुख़ की साहस की जीत ही मानी जानी चाहिए । और कुछ सिनेमा घरो में नहीं रिलीज़ नहीं हुई तो इसे बाल ठाकरे की बेवकूफी का नतीजा । लेकिन इसे एक सन्देश तो चला ही गया की अगर कोई शिव सेना की विरोध में डट कर खड़ा हो जाये तो नतीजा कुछ और ही की जायेगा । पहले कहा ठाकरे की इच्छा पर पूरी मुंबई बंद हो जाती थी , पर आज उसी ठाकरे के आदेश का असर बेहद कम हो गया है , नतीजा फिल्म रिलीज़ हुई , 63 जगह पे हुई, पर हुई तो ।

पिछले दस दिनों में ये ठाकरे की दूसरी "हार" है । पहली राहुल की मुंबई यात्रा के समय और आज जब फिल्म रिलीज़ हुई । ये ड्रामा अब केवल शाहरुख़ बनाम ठाकरे नहीं, बल्कि शिव सेना बनाम कांग्रेस थी । या है । ठाकरे को अपनी ताकत दिखानी थी , और सरकार को अपनी । महारास्त्र के ही कुछ राज नेताओ ने ठाकरे को सत्ता से उपर मान लिया था जो भ्रम अब टूट रहा है । इन नेता लोगो में शरद पोवार , स्व प्रमोद महाजन थे।

इसी मुद्दे पे ठाकरे ने दो बार पलटी मारी । जब प्रदर्शन बंद किया फिल्म के विरोध में तो, और फिर पलटी मारी प्रदर्शन शुरु करके । विरोध दोबारा सुरु करने की पहले शरद पोवार ठाकरे से मिलने गये थे, उसी के बाद ठाकरे और मुखर हो गये । शायद पोवार का साथ मिल गया था । आखिर कांग्रेस के भरी पड़ने से इन्ही दोनों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है । परदे के पीछे की राजनीती बहुत बड़ी है भाई । निशाना किसी और जगह और चारा कोई और । मुझे लगता है ठाकरे अपनी ताकत दिखने की लिए शाहरुख़ को चारा बनाया (बहाना भले ही कुछ और हो ), पर खान आसन चारा साबित नहीं हुए । दो हाथी की लड़ाई में पीसता घास ही है । फिल्म उद्योग पिस रहा है ।

अब उनके भतीजे राज ठाकरे कह रहे है की शिव सेना ने अमिताभ बच्चन को क्यों छोड़ दिया , जबकि उन्होंने एक पाकिस्तानी कलाकार के साथ मंच शेयर किया था । तो राज को यह मालूम होना चाहिए की वो प्रोग्राम "अमन की आशा" के तहत times of india ने कराया था । अगर अपना महानायक किसी पकस्तानी कलाकार के साथ खड़ा होता है तो बुरा है , और वही कलाकार अपना कोई प्रोग्राम भारत में करता है तो कोई बात नहीं । गुलाम अली साहब या रहत फ़तेह अली खान को क्यों नहीं रोका । राज जनता है की ये दोनों उनसे ज्यादा उन्ही के अपने देश में लोकप्रिय है । कुलमिला के यह की ये मानसिक दिवालियेपन का साबुत है । इनकी राजनीती ही नफरत के अधर पे है । अगर सब लोग प्रेम के साथ मिलजुल के रहने लगे तो इन दोनों ठाकरे भाई को पैर में पाजेब बांध के किसी कोठे पे बैठ जाना पड़ेगा । क्यों की इनसे साफ़ सुथरी राजनीती हो ही नही पायेगी । बड़े ठाकरे तो कभी अपने कहे पे टिकते ही नहीं है । कब पलटी मार दे कोई भरोसा नहीं है । यही दोगलापन उनकी राजनीती आधार है।

इस लड़ाई में भले ही कोई नहीं जीता हो , पर हार तो ठाकरे की ही हुई है।
मैं ठाकरे साब को My Name Is Khan देखने की सलाह देता हूँ , देखे की कितनी अच्छी मूवी है, शाहरुख़ की Chak De India के बाद सबसे अच्छी मूवी है ।

"तुम इन सहर के खुलुसो से वाकिफ नहीं फ़राज़ ,
ये तो मोहसिन को भी सरे आम सजा देते है ॥ "

1 comment:

  1. I think they r jst making it a religious issue....The Religion is a matter of personal Choice. It should never affect the life of others and create any serious & difficult conditions for Human society......lastly i would jst say tht plzzzzz don't behave like KID (bal) THACKERAY

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